कर्ज के बोझ तले कराह रहा पाकिस्तान, कर्जा लेकर चल रहे रोजमर्रा के खर्चे

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पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से गहराते आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश में बढ़ता बाहरी कर्ज, सुस्त आर्थिक वृद्धि और कमजोर संरचनात्मक सुधार, जो दशकों की खराब शासन व्यवस्था और बाहरी वित्तपोषण पर अत्यधिक निर्भरता का नतीजा हैं। यह देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बना रहे हैं। 

पाकिस्तान का कुल कर्ज 134 अरब डॉलर तक पहुंचा

वन वर्ल्ड ऑउटलुक में प्राकिशत लेख के अनुसार पाकिस्तान का कुल बाहरी कर्ज 2025 के अंत तक लगभग 134 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश को 23-26 अरब डॉलर के बाहरी ऋण सेवा (मूलधन और ब्याज सहित) का सामना करना है, जिससे भुगतान संतुलन पर गंभीर दबाव है।

सहयोगी देशों के भरोसे जीने को मजबूर है पाकिस्तान 

हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा पाकिस्तान के 2 अरब डॉलर के कर्ज का रोलओवर किया जाना इस नाजुक वित्तीय स्थिति को दर्शाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के अस्थायी उपाय पाकिस्तान के सहयोगी देशों UAE, सऊदी अरब और चीन पर निरंतर निर्भरता को रेखांकित करते हैं। इनके सहारे पाकिस्तान तत्काल डिफॉल्ट जोखिम टलता रहा है। हालांकि, यूएई द्वारा केवल एक महीने का विस्तार देना जोखिम धारणा में बदलाव या भू-राजनीतिक कारणों की ओर भी इशारा करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार में कुछ सुधार जरूर दिखा है।

जनवरी 2026 के अंत तक कुल तरल भंडार 21.29 अरब डॉलर तक पहुंच गया, लेकिन आगामी परिपक्वताओं और आयात आवश्यकताओं के चलते यह स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की 7 अरब डॉलर की एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (EFF), जिसे सितंबर 2024 में मंजूरी मिली थी, स्थिरता के लिए अहम रही है।
दिसंबर 2025 में दूसरे रिव्यू के पूरा होने के बाद किस्त जारी हुई, लेकिन आगे की प्रगति वित्तीय अनुशासन, कर आधार विस्तार और सार्वजनिक उपक्रमों (SOE) के सुधारों पर निर्भर करेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, इस साल द्विपक्षीय रोलओवर प्रतिबद्धताएं करीब 12 अरब डॉलर की हैं, लेकिन शर्तें अब पहले की तुलना में अधिक व्यावसायिक होती दिख रही हैं।
आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों के साथ रोजगार संकट भी गहराता जा रहा है
आधिकारिक बेरोजगारी दर 2024-25 में बढ़कर करीब 6.9% हो गई, जबकि 2020-21 से 2024-25 के बीच बेरोजगारों की संख्या में 31% (लगभग 14 लाख) की वृद्धि दर्ज की गई।
सीमित अवसरों, ठहरी हुई मजदूरी और बढ़ती महंगाई के कारण बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में विदेश जा रहे हैं।
अर्थव्यवस्था की मौजूदा वृद्धि दर करीब 3% रही है, जो तेजी से बढ़ती आबादी और हर साल आवश्यक 15 लाख नई नौकरियों के लिहाज से नाकाफी मानी जा रही है।
आईएमएफ कार्यक्रमों के तहत करों और ऊर्जा शुल्क में बढ़ोतरी, साथ ही प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़ के असर ने हालात और मुश्किल बना दिए हैं।